बुधवार, 11 जुलाई 2018

न्याय+आलय


भाग 10

अभी कुछ समय पहले ही फेसबुक पर एक महानुभाव से वाद-विवाद हुआ। मेरे लिए वो अपरिचित थे। पर फेसबुक ऐसा पायदान हैं जहां परिचित-अपरिचित सभी अपने विचारों का आदान प्रदान करते हैं, पूरी स्वकछंदता के साथ। मसला ये था कि मैंने अपनी एक फेसबुक महिला मित्र की टाइमलाइन पर मंदसौर में हुए बलात्कार की पीड़िता से संबन्धित एक पोस्ट देखा जो उसने किसी अजीब हिन्दुत्व पेज से उठा कर साझा किया था। उस पोस्ट पर उस अपराधी की तस्वीर और पीड़िता के नाम के साथ हिन्दू-मुस्लिम विवाद खड़ा करने जैसा कंटैंट था। मेरे अंदर का वकील कहिए या जिम्मेदार नागरिक या बस खुली और सरल सोच के मेरे व्यक्तित्व ने ये फर्ज़ समझा कि मैं उसे ये समझाऊँ (चूंकि वो मेरी मित्र भी है) कि बलात्कार पीड़िता का नाम या जानकारी उजागर करना कानूनन दंडनीय अपराध है और कृपया वो इस दुष्कर्म को धार्मिक रंग देने वालों का समर्थन करते हुए ऐसे पोस्ट को साझा ना करे। बस मैंने ऐसा ही कुछ टिप्पणी में लिख दिया। अब यहाँ बता दूँ कि वो मेरी मित्र कमसेकम मुझसे उम्र में 8 साल तो छोटी होगी ही। उसे मेरी बात पसंद नहीं आयी और कुछ बहस छिड़ी। उस बहस में ये महानुभाव जो उसके फेसबुक मित्र हैं इस बहस में कूद पड़े और मेरी बात को सिरे से नकारा। मैंने फिर अपनी बात को समझाने के लिए ये स्पष्ट किया कि मैं एक अधिवक्ता हूँ, कानून की समझ रखती हूँ और इसीलिए अपना उत्तरदायित्व समझती हूँ कि कमसेकम अपने मित्रों को सही-गलत समझा पाऊँ। पर कोई फायदा नहीं हुआ और छोटी सी बात विवाद में तब्दील हो गयी।

उस विवाद का परिणाम ये निकला कि जब उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं बचा तो उन्होने मेरे वकील होने, मेरी अँग्रेजी की त्रुटियों, मेरे जीवन जिसके बारे में वो कुछ नहीं जानते, इत्यादि पर उन्होने निजी और अभद्र टिप्पणियाँ करनी शुरू कर दीं। काफी देर तक मैंने प्रयास किया कि सदी हुई भाषा में इस अनेपक्षित और अनावश्यक अपमान का सामना दृढ़ता से करूँ और उन्हें जवाब देती रहूँ। पर फिर हार-थक कर मैंने ही अपनी पराजय स्वीकार की और उनसे क्षमा भी मांगी कि आइंदा मैं अपने ज्ञान को उन जैसों के साथ साझा करने से पहले 100 बार सोचूँगी।

माना कि हमारे संविधान ने वाक स्वतन्त्रता का अधिकार हमें दिया है और सोशल मीडिया ने हमें अपनी बात अजनबियों तक भी पहुंचाने का मौका दिया है। पर नियम, कानून का उल्लंघन, और अनावश्यक अपमानजनक टिप्पणियाँ कहाँ तक उचित है। छठी कक्षा में हमारा परिचय नीतिशास्त्र यानी सिविक्स से कराया जाता है। जहां हमें सबसे पहले हमारे मौलिक अधिकार और कर्तव्यों का पाठ पढ़ाया जाता है। इसके लिए वकील होने की ज़रूरत नहीं पड़ती। पर बड़े होते-होते हमें केवल अधिकार ही याद क्यूँ रह जाते हैं, उन कर्तव्यों का क्या जो संविधान में मौजूद हैं और जिन्हें हमारे लिए निभाना आवश्यक है। उन्हीं कर्तव्यों में से एक है भारतीय न्यायव्यवस्था, नियम, कानून का सम्मान और सुरक्षा।

अपराधों के लिए दंडव्यवस्था, पीड़ितों की सुरक्षा के लिए न्यायव्यवस्था बनाते समय बहुत कुछ ध्यान में रखा गया है। ये किसी क्षणिक आवेग में बने हुए नियम कानून नहीं हैं, जिनका हम खुले आम उपहास उड़ा सकते हैं। अगर उपरलिखित मसले की ही चर्चा करें तो बलात्कार/शारीरिक शोषण पीड़िता की निजी जानकारी को गुप्त रखने के पीछे जो सख्त नियम हैं और उस सूचना को उजागर करने वाले के लिए सख्त दंड का प्रावधान है, वो इसलिए क्यूंकी उस पीड़िता की स्थिति संवेदनशील होती है। उसकी और उसके परिवार की सुरक्षा का दायित्व एक बहुत बड़ी और मुश्किल ज़िम्मेदारी होती है। न केवल सामाजिक बल्कि अराजक तत्वों से उसकी सुरक्षा करना तभी संभव हो सकता है जब उसकी सूचना (उसका चित्र, उसका नाम और अन्य जानकारी) पूरी तरह से गुप्त राखी जाए। इतनी छोटी सी बात लोगों को समझ नहीं आती। क्या लगता है इस प्रकार उसकी निजी जानकारी उजागर कर के, उसकी स्थिति और संवेदनशील कर के कैसे उसे न्याय प्राप्ति में आप सहायता प्रदान कर रहे हैं। आप सिर्फ उसकी मुश्किलें बढ़ा रहे हैं। इसके साथ ही किसी भी अपराध को धर्म से जोड़ कर प्रस्तुत करना निहायती घिनौनी प्रक्रिया है। दोषी, उसका अपराध और उसके लिए मिलने वाला दंड समान ही रहेगा चाहे वो किसी भी धर्म से संबंध रखने वाले व्यक्ति ने किया हो।

ये कोई जटिल गणितीय सूत्र नहीं है जो समझने में दिक्कत हो। पर फिर भी लोग खास तौर से युवा वर्ग किसी नए ज्ञान को जज़्ब करने के लिए ना तो तैयार है और ना ही खुद अपना ज्ञान बढ़ाने का इक्षुक। अब आगे बात आती है उन महानुभाव कि जिनहोने मेरा भरपूर अपमान किया। वो देश की राजधानी से सटे साइबर हब में एक बीपीओ में कार्यरत हैं। वकीलों के जीवन, कार्य प्रणाली, परिशर्म इत्यादि से बिलकुल अनिभिज्ञ हैं। पर दोष देना उन्हें अच्छी तरह से आता है। उनके हिसाब से मेरा जीवन नीरस है, मैंने शायद यूं हीं वकालत पास कर ली और मैं एक कुंठनीय जीवन व्यतीत करती हूँ। जिसके विपरीत उनका जीवन अत्यंत ही आनंददायक और जीवंत है। मेरी अँग्रेजी कमजोर है और मेरे जैसे लोगों का कोई खास भविष्य नहीं होता।

हालांकि उन्हें ये लेख पढ़ने को नहीं मिलेगा, मिलेगा भी शायद तो वो ठीक से पढ़ कर समझ ना पाएँ क्यूंकी वो एक गैर हिन्दी भाषी राज्य से हैं। फिर भी मैं आज अपनी प्रोफेशनल जीवन से संबन्धित कुछ भावनाएं व्यक्त करना चाहती हूँ।

वकील एकमात्र ऐसी कौम है जो आवश्यक रूप से दोहरे स्नातक होते हैं। आप डॉक्टर, इंजीनियर, एम.बी.ए. इत्यादि कुछ भी पढ़ सकते हैं, बन सकते हैं, कोई भी दिशा चुन सकते हैं। पर वकालत पढ़ के वकील होने के लिए पहले से ही स्नातक होना आवश्यक होता है। अब तो स्नातक उपाधि पाने के बाद वकालत की डिग्री की तीन साल की पढ़ाई करने के लिए पहले एक इम्तिहान देना पड़ता है जो आपकी योग्यता को मापता है कि कौन इस पेशे के लायक है और कौन नहीं। उसके बाद जब आप वकालत की डिग्री प्राप्त करते हैं तो अदालत में वकील के रूप में आधिकारिक पंजीयन पाने के लिए भी एक इम्तिहान से दो-चार होना पड़ता है। ये इम्तिहान भी आल-इंडिया लेवेल पर होता है और संबन्धित राज्य बार-काउनसिल्स के अधीन होता है। इस परीक्षा के जरिये नए विधि डिग्री धारकों की जांच होती है कि वो वकालत के लिए तैयार हैं भी या नहीं। इंटर के बाद 7 साल का अथक परिश्रम जा के आपको कहीं एक अधिवक्ता या वकील के रूप में कार्य करने का अवसर देता है। उसके बाद कुछ समय और निवेश करना पड़ता है अदालत की कार्यप्रणाली को समझने और सीखने के लिए। इस सब के बारे में मैं इस शृंखला के शुरुआती भागों में चर्चा कर चुकी हूँ। अदालत में एक बार अपनी जगह बना लेने पर हमारा दिन शायद एक 10 रुपये के नोट से शुरू होता हो पर आप अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते कि दिन के अंत तक या माह के अंत तक हम कितना कमा सकते है। माना कि आज गूगल कर के आप सारा कानून जान सकते हैं। पर अदालत में किस नियम को कहाँ और कैसे प्रयोग करना है ये हम जानते और समझते हैं। हम हैं जो साधारण जनता का प्रतिनितिधित्व न्यायाधीश के सामने दृढ़ हो कर करते हैं। हम केवल आजीविका नहीं कमाते, हम न्याय कमाते हैं, न्याय दिलाते हैं।

हर व्यक्ति का अपना कार्यक्षेत्र होता है, कोई छोटा या बड़ा नहीं। कोई बहतर या कोई बद्तर नहीं। माना कि हम 12-14 घंटे ए.सी. दफ्तरों में कंप्यूटर के सामने आँखें गड़ाए उँगलियाँ नहीं चलाते, पर महनत में हमारे कोई कमी नहीं है। जब हम अपनी आजीविका के लिए कार्यरत होते हैं तो उससे कोई और भी फलीभूत हो रहा होता है। रही बात भाषा की तो हम अँग्रेजी या हिन्दी के मोहताज नहीं। हमें भारत की 3 आधिकारिक भाषाओं में काम करने में आदत होती है। हिन्दी (हिन्दी भाषी राज्यों के लिए), अँग्रेजी और उर्दू (देवनागरी लिपि में)।          


शुक्रवार, 6 जुलाई 2018

न्याय+आलय


भाग 9

................जैसा कि मैंने पिछले भाग में चर्चा की, भारतीय न्यायव्यवस्था में एक बड़ी लूप होल है बनाए गए कानून का दुरुपयोग। जी हाँ, कानून बनाए गए लोगो के हितों और उनकी सुरक्षा के लिए। पर उनका सही उपयोग जितना हो पाता हो पर दुष्प्रयोग बहुत होता है और ये एक बहुत बड़ा कारण है पीड़ितों को न्याय प्राप्ति में देर लगती है।

भारत में सबसे ज़्यादा दुष्प्रयोग होने वाले क़ानूनों में मुख्य है- स्त्रियॉं के हितों और सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून, जिनमें दहेज, घरेलू हिंसा, बलात्कार, और शारीरिक व मानसिक शोषण। सदा सर्वदा से ही भारत में स्त्रियों की स्थिति अधर में रही है। पहले बेटियों को पिता की संपत्ति में अधिकार प्राप्त नहीं था, तो शादी के बाद उन्हें घरेलू हिंसा और दहेज प्रथा के दुराचार से गुजरना पड़ता था (आज भी गुजरना पड़ता है), बलात्कार और शारीरिक शोषण के बारे में तो लगभग हर रोज़ 6-7 मामले ऐसे होते हैं जो सामने आते हैं, छुपे हुए कितने होंगे इसका तो हमें कोई अंदाज़ा ही नहीं। मात्र घर ही नहीं नौकरी पेशा महिलाओं का अनेकों शोषणों से सामना होता ही रहता है। इसी सब के अंतर्गत संविधान में महिलाओं की सुरक्षा और हितों को ध्यान में रखते हुए उनके लिए कानून बनाए गए। जिससे कि उनके जीवन की कठिनाइयों में कुछ हद तक कमी आ सके। कमी आई भी है, शिक्षित और जागरूक होने के साथ-साथ ही समाज में परिवर्तन भी आए हैं। लोगों में कुछ हद तक न्यायपालिका का डर भी है। पर ऐसा नहीं है कि अपराध घट गए हों। हाँ पीड़ितों को न्याय अवश्य मिल जाता है। देर-सवेर ही सही। दहेज प्रथा और घरेलू हिंसा, बलात्कार इत्यादि को ले के सख्त दंड प्रक्रिया है।

ये दंड प्रक्रिया जहां तक एक वरदान है वहीं एक बहुत बड़ा श्राप तब सिद्ध होती है जब महिलाएं इसका दुरुपयोग करती हैं, चाहे मर्ज़ी से या परिस्थितियों से विवश हो कर। कई मामले ऐसे देखे गए हैं जहां प्रेम शादी तक नहीं पहुँच पाता और प्रेमिका रुष्ट हो कर प्रतिकार चाहती है और अपने प्रेमी के विरुद्ध शारीरिक शोषण या बलात्कार का मामला दर्ज करा देती है। कई बार ऐसा हुआ है जहां लड़का-लड़की अपनी इक्षा से घर से भाग जाते हैं और पकड़े जाने पर लड़की को इक्षा या विवशता में लड़के के विरुद्ध बयान देना पड़ता है, और लड़के पर अपहरण और शोषण का मुक़द्दमा दायर होता है। दोनों ही मामलों में लड़के का जीवन बरबादी की ओर अग्रसर हो जाता है। सालों साल लड़की और लड़के का परिवार पुलिस, और अदालत के चक्कर काटते हुए निकालता है। जिसका अंतिम निर्णय या तो समझौते पर आ कर रुकता है या लड़के को सज़ा हो जाती है। दूसरे मामले में गौर करें तो यदि लड़की नाबालिग है तो समझिए उस लड़के के जीवन का एक अच्छा समय जेल में कटेगा। मामला दोनों में से कोई हो दोनों परिवारों का, पुलिस का, अदालत का, वकील का, सभी का समय नष्ट होगा।

अगर घरेलू हिंसा और दहेज विरोधी कानून के संबंध में बात करें तो जहां दहेज के लिए घर से निकाली हुई, प्रताड़ित की गयी महिलाएं हैं वहीं जला कर, या किसी और प्रकार से मार दी गईं महिलाओं के मामले हमेशा से सामने आते रहे हैं। ये अपराध इतने जघन्य हैं कि इनकी गंभीरता को ध्यान में रखते हुए ये स्त्री प्रधान न्यायव्यवस्था का एक प्रतिरूप माने जा सकते हैं। इनका निर्माण कुछ इस प्रकार किया गया है कि इसमें पीड़िता की शिकायत को प्राथमिकता पे रख कर आगे की प्रक्रिया या जांच को निर्धारित किया गया है। हालात बदले हैं, समाज भी बदला है, इसी प्रकार सोच भी बदली है। अक्सर देखने में आ रहा है कि अनावश्यक कारणों के चलते स्त्रियाँ अब शादी के तुरंत बाद ही अपना ससुराल स्वयं छोड़ देती हैं और फिर अपने पती और ससुराल पक्ष पर दहेज और घरेलू हिंसा का दावा दायर कर देती है। उनका सीधा सा मकसद होता है शादी से विलग होना पर अपने पती की संपत्ति में हिस्सा प्राप्त कर के। पहले ऐसे मामलों में ससुराल पक्ष की सीधी गिरफ्तारी होती थी पर इसका दुरुपयोग देखते हुए इस नियम में थोड़ी ढील दी गयी है और अब मामला दर्ज कर लिया जाता है और यदि हत्या और हत्या का प्रयास ना हुआ हो तो गिरफ्तारी नहीं की जाती। इन झूठे मामलों का भी निष्कर्ष आखिरकार समझौते पर ही निकलता है। पर इस सब में कुछ महीने या साल निकल जाते हैं और अदालत और पुलिस का बहुत सारा समय व्यर्थ हो जाता है।

मैं ये बिलकुल नहीं कह रही हूँ कि सभी महिलाएं झूठी हैं या सभी मामले झूठे हैं। मैं ये कह रही हूँ कि ऐसे झूठे मामलो की तादात बढ़ती जा रही है। जिसका सीधा प्रभाव असली पीड़ितों को मिलने वाले न्याय पर पड़ता है। इसी संदर्भ में जब सन 2012 में POCSO Act (Prevention of Children Against Sexual Offences) को न्यायव्यवस्था में स्थान मिला तो ये भी नाबालिग बच्चों पर हो रहे शोषण के खिलाफ एक वरदान की तरह सिद्ध हुआ। इस एक्ट के अंतर्गत नवजात शिशु से ले के 17 साल तक के नाबालिग लड़के और लड़कियों पर होने वाले शारीरिक शोषण के विरुद्ध सख्त दंड प्रक्रिया का विधान है। पर समस्या वही है, दुरुपयोग। और जहां तक मैंने देखा है इस एक्ट का दुरुपयोग करने वाले गाँव-देहात के लोग हैं।

अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए, अपनी दुश्मनी किसी से निभाने के लिए अपनी स्त्रियों या बच्चों का ऐसा उपयोग मत कीजिये। कानून आपकी सुरक्षा के लिए है ना कि नाजायज स्वार्थों को सिद्ध करने के लिए। कानून बनाया गया पीड़ितों के कष्ट हरने के लिए, किसी और को पीड़ित बनाने के लिए नहीं। अगली बार जब आप न्यायव्यवस्था, न्यायपालिका, अदालत, पुलिस और वकील पर न्याय मिलने में देरी या आलस्य का दोष लगाएँ और उंगली उठाएँ तो इस बात पर गौर ज़रूर करें कि आपकी बाकी 3 उँगलियाँ और 1 अंगूठा कहीं आपकी ही ओर तो नहीं घूम गए। जब भी कोई फर्जी मामला अदालत में दायर करने जाएँ तो एक बार अपनी आत्मा को झिंझोड़ें ज़रूर और सोचें कि आपके कारण किस पीड़ित को न्याय मिलने में देरी हो रही है और उसकी अवस्था आपके मुक़ाबले क्या है?

न्यायपालिका अपने कार्य में सक्षम है, दोष रहित है और समर्पित है। जब हम अपने अधिकारों को जानते और समझते हैं तो अब आवश्यकता है कि अपने दायित्वों को भी समझें और स्वीकारें। न्यायपालिका हमारे देश का एक आवश्यक और मजबूत स्तम्भ है, और जब ये स्तम्भ हमारे देश की इमारत को साधे हुए है तो हमारा भी कर्तव्य बनता है कि इस स्तम्भ की मज़बूती को कमजोर ना पड़ने दें और इसका दुरुपयोग ना करते हुए अपना सच्चा योगदान दें।
 
    

शनिवार, 30 जून 2018

न्याय+आलय


भाग 8

हास्य व्यंग से शुरू हुई ये शृंखला अब गंभीर होने लगी है क्यूंकी जिन मनोभावों के साथ अब मैं लिखती हूँ वो गंभीर हैं। जब तक मैंने वकालत की पढ़ाई नहीं की थी या सही कहूँ तो जब तक कचहरी आना शुरू नहीं किया था तब तक मैं भी वैसी ही थी जैसे सब हैं। न्यायपालिका और कानून व्यवस्था को दोष देने वाले। “तारीख पे तारीख मिलती है साहब पर यहा इंसाफ नहीं मिलता।“ कहना बहुत आसान है और जमीनी हकीकत भी है। पर ऐसा है क्यूँ? क्या कारण है? क्या न्यायपालिका वाकई इतनी अक्षम है, वकील, न्यायाधीश, कर्मचारी, पुलिस सब निरर्थक हैं। क्या कोई भी ठीक से काम नहीं करता? क्या किसी का अपने काम के प्रति समर्पण नहीं है? ये बहुत सारे सवाल हैं जिनके जवाब इस कचहरी का भाग होने वाला ही जान और समझ सकता है।

ऐसा बिलकुल नहीं है कि कोई काम नहीं करता, कोई समर्पित नहीं है। हर व्यक्ति अपनी आजीविका कमाने के लिए कार्य आरंभ करता है पर धीरे-धीरे समय बीतने के साथ ही समर्पण का भाव स्वतः ही उसके अंदर समाहित हो जाता है। वकीलों को दोष देना भी आसान है कि वो अपराधियों का भी पक्ष लेते हैं। पर कोई नहीं समझता कि वकील कभी तय नहीं करता कि उसका मुवक्किल जिसका वो पक्ष ले रहा है वो अपराधी है या निर्दोष। ये अदालत का काम है। जैसा कि हमारे संविधान में स्पष्ट है कि “कोई व्यक्ति जब तक अपराधी साबित ना हो जाए तब तक वो निर्दोष है” और “भारत के प्रत्येक नागरिक को न्याय पाने के लिए बराबर और उचित अवसर दिया जाना चाहिए, बिना उसकी जाती, धर्म, रंग, रूप में भेद किए।“ इसी संदर्भ में वकील या अधिवक्ता का कार्य होता है अपने मुवक्किल का पक्ष अदालत के सामने रखना बिना किसी भेदभाव के। यदि वकील पहले ही निर्णय ले लेगा कि उसका मुवक्किल दोषी है तो चाह कर के भी वो उसकी निर्दोषता साबित नहीं कर पाएगा और यदि वो मान के चलेगा कि वो निर्दोष है तो उसे अपराधी सिद्ध होने से बचा नहीं पाएगा। एक वकील को दोनों ही पक्षों के आधार पर अपने वाद की रूपरेखा तैयार करनी पड़ती है।

अब बात है कि न्यायपालिका में न्याय पाने के लिए इतना समय क्यूँ लगता है। हालांकि इस देरी से बचने के लिए फास्ट ट्रेक कोर्ट्स भी स्थापित किए गए हैं। पर समस्या वही है जो पहले थी। जिसका एक बड़ा और मुख्य कारण है वादों की अधिकता। स्थिति ये है कि प्रत्येक दिन लगभग हर अदालत में चाहे वो जूनियर डिवीज़न हो या सीनियर डिवीज़न, निपटारे या सुनवाई के लिए चिन्हित वादों की संख्या 100 से भी अधिक होती है। मैंने ये संख्या 200 तक भी देखी है। सोच के देखिये एक वाद कायदे से सुनने में कम से कम भी समय लगा तो 10 मिनट। अगर किसी वाद में बहस है तो वो आधे घंटे तक जा सकती है। यही अगर किसी वाद में बयान होने हैं तो उसमे भी 20-25 मिनट या अधिक का समय लग जाता है। अब एक दिन में जितने वाद चिन्हित हैं उनमे कितनों में बयान होने हैं, कितने दर्ज होने हैं, कितनो में बहस होनी है, कितनों को सुना जाना है और कितनों में जज को किसी प्रकार का निर्णय देना है? गर्मियों में सुबह 6 बजे से आरंभ हो जाने वाली कचहरी का कार्य शाम 4 बजे तक चलता है और सर्दियों में प्रातः 10 बजे से साँय 6 बजे तक। उसके अलावा जज की इक्षा और क्षमता के ऊपर है कि वो निस्तारण के लिए कितनी और देर तक अपनी कुर्सी पर बैठा रह सकता है।

क्या लगता है? जज, वकील, अर्दली, पेशकार, कार्यालय कर्मचारी इंसान नहीं है दिव्यआत्मायें हैं। जिनके पास अथाह शारीरिक और मानसिक बल है। क्या प्रत्येक दिन में 200 के आस पास वादों का निस्तारण संभव है? क्या ये मानवीय क्षमता के अंतर्गत आता है? अपने अन्तर्मन से ही प्रश्न करें, उत्तर मिल जाएगा। माना कि मामलो का निस्तारण न्यायपालिका और उसके अधीन कर्मचारियों का उत्तरदायित्व है। पर क्या साधारण जनता कभी विचार करती है कि मामलों की ये अधिकता आखिर है क्यूँ?

कचहरी का भाग बनिए तो जानेंगे कि झूठे मुकद्दमों की संख्या कितनी है। या फिर वो मामले कितने हैं जिन्हें सिर्फ दूसरे पक्ष पर दबाव बनाने के लिए दायर किया जाता है। कितने मामले ऐसे हैं जो पारिवारिक दुश्मनी में दाखिल किए जाते हैं और फिर कितने मामले ऐसे हैं जिनमे वाकई त्वरित न्याय की अपेक्षा और आवश्यकता है। न्यायपालिका को दोष देना सरल से सरलतम है पर न्याय में देरी की जिम्मेदार न्यायपालिका की नहीं बल्कि आप है। घर का नाली विवाद हो, गाँव में खेत का विवाद हो, आपसी रंजिश में दायर किया गया कोई झूठा विवाद हो, सड़क पर हो गयी छुटपुट नोक-झोंक का विवाद हो, घरेलू संपत्ति का विवाद हो, या फिर यूं ही किसी पर अपना वर्चस्व जमाने के लिए दायर किया गया किसी प्रकार का फ़ौजदारी वाद। इनकी संख्या इतनी ज़्यादा है कि असल में न्याय के लिए तड़पते पीड़ित अपनी तारीख का ही इंतज़ार करते रह जाते हैं।

मुझे चिढ़ होती थी देख के, जब देहात से आने वाले लोग जिनके पास असल में आने-जाने का किराया भी पूरा नहीं होता था, अपनी पत्नी या बेटी को ले के उनके ही गाँव के किसी अन्य व्यक्ति पर किसी अनावश्यक कारण से छेड़छाड़ का झूठा मुक़द्दमा दर्ज कराने आ जाते थे। गाँव-देहात में अक्सर लोगों के बीच कहा सुनी और छुटपुट मारपीट की घटनाएँ हो ही जाती हैं। उनका निपटारा जब पंचायत में नहीं हो पाता तो वो अदालत चले आते हैं और ये तरीका अपनाते हैं। उसके बाद पूरी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। महिला को महिला थाने ले जाओ, उसकी डॉकटरी जांच कराओ, फिर रिपोर्ट सहित केस अदालत में दायर कराओ, बयान काराओ, और फिर 15 दिन बाद दोनों पक्षों के बीच सुलह हो जाएगी, पैसे का लेन देन हो जाएगा, मामला रफा-दफा। वकील और अदालत दोनों का समय व्यर्थ दोनों मूर्ख साबित होंगे। इसी सब के चलते जब कोई असली मामला सामने आता है तो भेड़िया आया वाले अंदाज़ में उस पीड़िता के साथ महिला पुलिस, डॉक्टर और अदालत व्यवहार करती है। क्यूंकी सभी इतने त्रस्त होते हैं कि जब तक उसकी डाक्टरी जांच में ये सिद्ध नहीं हो जाता कि वो सचमुच बलात्कार या किसी प्रकार के शोषण से पीड़ित हुई है, उसके प्रति कोई सहनभूति नहीं रख पाता।

भारत में न्याय को बहुत हल्के में और मज़ाक के तौर पर लिया जाता है। यहाँ कानून का प्रयोग होने से पहले दुष्प्रयोग शुरू हो जाता है। इस पर अगले अंक में और विस्तार से लिखूँगी......             

शुक्रवार, 22 जून 2018

न्याय+आलय


भाग 7

इस शृंखला के दूसरे भाग में मैंने शोषण शब्द का प्रयोग किया था। आज उसी के बारे में बताती हूँ। कचहरी में सिर्फ न्याय ही नहीं शोषण भी होता है। वो भी किसी एक व्यक्ति विशेष के साथ नहीं लगभग हर उस व्यक्ति के साथ जो न्यायालय से संबंध रखता है। सबसे नीचे से शुरू करें तो मुवक्किल और सबसे ऊपर की बात करें तो जज। सही मायने में सभी शोषक भी हैं और शोषित भी। कभी मुवक्किल वकील का तो कभी वकील मुवक्किल का शोषण कर लेता है। कभी जज वकील का तो कभी वकील जज का। अक्सर पेशकार, दफ्तरी, कार्यालय कर्मचारी, अर्दली, वादी और प्रतिवादी का शोषण कर लेते हैं तो कभी-कभी कोई वादी-प्रतिवादी भी उन पर भारी पड़ जाता है। यहाँ सभी उदाहरणों में शोषण का भाव केवल और केवल आर्थिक है। कभी वकील मुवक्किल से मनमाने पैसे ऐंठ लेता है, कभी मुवक्किल बिना फीस चुकाए ही अपना काम निकाल लेता है। ये ही सिलसिला सभी पदों पर आसीन लोगों और जनता के बीच चलता ही रहता है।

सारे जज इस प्रकार के शोषण की श्रेणी में नहीं आते। कुछ आते हैं। अब चूंकि भ्रष्टाचार हर विभाग में है तो कचहरी में भी है। पर फिर भी मेरा अनुभव है कि न्यायालय में भ्रष्टाचार का चरम नहीं है। हाँ, पर न्यायाधीशों को राजनीतिक दबाव और शोषण का शिकार होना पड़ता है। वादों की अधिकता और हाइ प्रोफ़ाइल केसेज़ में निर्णय देने का तनाव बहुत गंभीर होता है।

खैर कचहरी में जो सबसे ज़्यादा शोषित है वो है किसी भी वकील का जूनियर। छोटे शहर की कचहरी में कोई अधिवक्ता किसी को जूनियर रखते हुए उसे स्टाइपेंड नहीं देता। वैसे तो हमारी खुद की मजबूरी होती है वकालत के गुर सीखने के लिए एक गुरु की शरण लेना और जैसा कि सर्वविदित है या कहें कि पुरातन काल से प्रथा है कि गुरु से ज्ञान लेने के लिए उसे गुरु दक्षिणा देते हैं, ना कि ज्ञान लेने की प्रक्रिया में किए गए उसके निजी कार्यों के लिए पारिश्रमिक। तो बस गुरू की शरण में आओ और लग जाओ काम पे। अब होगा क्या कि गुरु जी, जो आपके आने से पहले तक खुद करते थे, वो अब चेले से कराएंगे। जैसे दरख्वास्त लिखना, अदालत में जमा करना, तारीखेँ लाना, संबन्धित अदालत के कार्यालय में जा कर वाद से जुड़ी सूचनाएँ इकट्ठी करना, पीने के लिए पानी लाना, इत्यादि-इत्यादि। खैर ये सब ज़रूरी है, सीखने के लिए और पानी पिलाना तो पुण्य का काम है।

पर इस सब में शोषण कहाँ है? अरे भाई! आते-आते ही शोषण शुरू थोड़े हो जाएगा। अब बात ये है कि उपरलिखित कार्य कोई जूनियर कितने दिन में सीख जाता है। 15 दिन या बहुत से बहुत 1 महीना। हाँ, सारी अदालतों और उनके कार्यालयों के नाम और रास्ते याद करने में थोड़ा समय और लगता है। बीच-बीच में न्यायालय परिसर में परिवर्तन भी होते रहते हैं। कब कौन सी अदालत का कमरा बदल जाएगा पता नहीं चलता, जब ढूंढते हुए पहुँचो तो कहीं ना कहीं मिल ही जाएगी। चलिये मान लिया कि दरख्वास्त लिखने का गुर सीखने में भी कुछ और समय लगता है। क्यूंकी इन प्रार्थनापत्रों के भी बहुतेरे प्रकार होते हैं। इन्हें रटा नहीं जा सकता, लिखते-लिखते ही अभ्यास होता है। सब मिला लो तो भी अधिकतम 6 महीने। 6 महीनों में कचहरी अपरिचित से अपनी-अपनी लगने लगती है। ज़्यादातर लोग पहचानने लगते हैं। पर इस सब में गुरु जी को ये समझ नहीं आता कि अब दरख्वास्तों और तारीखों से आगे बढ़ने का समय आ गया है। अब ये शिष्य के ऊपर भी निर्भर है कि उसने वो सीख पाया या नहीं जो गुरु जी ने सिखाया ही नहीं। कभी-कभी वाद पढ़ने का मौका लग ही जाता है, तो गुरु जी के दिमाग को पढ़ने का मौका मिल जाता है। उसके अलावा पोस्ट-मोरटेम रिपोर्ट्स, अस्पताल की जारी की गयी अन्य रिपोर्ट्स, किसी भी तरह का कागज़ी साक्ष्य, पुलिस रिपोर्ट्स आदि भी अगर पढ़ने का मौका मिलता रहा हो तो आपका वकील दिमाग चलता रहता है। पर गुरु जी को यकीन नहीं होता कि आप कितना और क्या सीख चुके हैं। उनका वही ढर्रा चलता रहता है। अगले कई सालों तक। किसी अदालत में जज के सामने बोलने का मौका तभी मिलेगा जब कोई ख़ास बात ना कहनी हो और गुरु जी वो बेख़ास बात खुद जा के कहने में रुचि ना रखते हों। ध्यान रहे कि इन 6 महीनों में जूनियर की कोई आमदनी नहीं होती है और कभी-कभी तो अपनी जेब से भी खर्च करना पड़ जाता है।

ये तो बात रही सिर्फ गुरु जी की, पर आपके गुरु जी के बस्ते के पास जितने वकील बैठते हों वो सब आपके गुरु स्वतः बन जाते हैं। नहीं-नहीं सिखाने के लिए नहीं, अपना-अपना काम कराने के लिए। फलाने कोर्ट में जा रही हो बिटिया, हमाई एप्लिकेशन भी लगा देना, और ये चार दरख्वास्तें और ले जाओ, इन्हें भी जगह पर जमा करती आना। डायरी देखा आना, फलाने केस में तारीख ले आना, वगैहरा। ये सब चलता ही रहता। अब शिष्य/शिष्या की मजबूरी है, सभी का हुक्म बजाना है। 3-3 मंजिलों पे बने ऑफिसों के चक्कर लगाने हैं। धूप में, गर्मी में, पसीने से लथपथ दौड़ लगाते रहना है, वो भी किसी और के काम के लिए जिसके लिए कोई पारिश्रमिक नहीं मिलना है।

जूनियर के शोषण का एक और बेहतरीन उदाहरण है उसका खर्चा करवाना। हर वर्ष ओथ कमिशनर (oath commissioner) के लिए नए वकीलों से आवेदन लिए जाते हैं और जो चुने जाते हैं वो 1 वर्ष के लिए ओथ कमिशनर के रूप में कार्यरत रहते हैं। ओथ कमिशनर का काम होता है एफ़िडेविट्स, बेल एप्लीकेशन्स, इत्यादि पर व्यक्ति का वेरिफिकेशन कर के टिकट और मोहर लगाना और अपने दस्त्ख्वत करना। इसके लिए उसे वो टिकट यहीं कचहरी से खरीदने पड़ते हैं (50-100 या अधिक रुपए के) और फिर जब भी कोई वेरिफिकेशन करना होता है तो उसके बदले उसकी फीस मिलती है (10-20 रुपये पर टिकट)। पर गुरु जी और आस पास वाले ना माने हुए गुरु भी वेरिफिकेशन करा जाते हैं, हस्ताक्षर-मोहर-टिकट सब लगवा जाते हैं पर फीस देना उन्हें याद नहीं रहता। मैंने तो अपनी वकालत के पहले साल में ही ये तमाशा देख लिया था। दोबारा ओथ कमिश्नर के लिए आवेदन ही नहीं किया।      

अब जूनियर शोषित लड़का है या शोषित लड़की इसका भी फर्क पड़ता है। मेहनत कराने के मामले में मेरी कचहरी के गुरु लड़कियों पर थोड़ा रहम रखते हैं। लड़कों के शोषण के बारे में बात करूंगी तो ये भाग समाप्त नहीं कर पाऊँगी.......  

रविवार, 17 जून 2018

न्याय+आलय


भाग 6
सेक्सिस्म (sexism), रेसिस्म (racism) और कास्टिस्म (casteism) ये सब तो भारत की प्रमुख विशेषताएँ हैं। इनके बिना भारत का अस्तित्व ही क्या है। सारे संसार से तुलना नहीं करुगी क्यूंकी मैं भारत में रहती हूँ, संसार के किसी अन्य देश में नहीं। ना ही देश छोड़ने या बदलने का कोई इरादा है। हाँ, तो जैसा मैं कह रही थी कि ये विशेषताएँ देश के प्रत्येक क्षेत्र में मिल जाती हैं। कोई भी डिपार्टमेंट इससे अछूता शायद ही हो। मुझे उम्मीद नहीं। तो फिर कचहरी कैसे इस सब से दूर रह सकती है। जी बिलकुल, मेरी कचहरी में भी सब मौजूद है।

सेक्सिस्म या जेंडर इनइक्वालिटी (gender inequality), सरल भाषा में कहूँ तो औरत और मर्द के बीच की प्रोफेशनल असमानता। यूं तो ये असमानता का कोई एक निश्चित क्षेत्र नहीं है फिर भी प्रोफेशनल पर खासतौर से ज़ोर इसलिए दे रही हूँ क्यूंकी यहाँ वकालत के संबंध में बात हो रही है। कमाल की बात है ना कि वैसे तो अक्सर पुरुष ये ताना मारते हैं कि औरतें बहस में बहुत तेज़ होती हैं और उनसे बहस में जीता नहीं जा सकता। हाँ, जो काफी हद तक ठीक भी है। तो फिर इसी तथ्य के मद्देनजर अगर औरत वकालत पढ़ के वकील बन जाती है तो इसमें इतनी तकलीफ की बात क्यूँ है और अचानक ही उसकी तर्क और बहस करने की क्षमता पर प्रश्ञ्चिंह क्यूँ लगा दिया जाता है।

मुझे नहीं पता कि बड़े शहरों की कचहरी में भी या उच्च और सर्वोच्च न्यायलाय में भी यही स्थिति है या नहीं। मैं वो जानती हूँ जो अनुभव मुझे अपने जिले की कचहरी से प्राप्त हुए हैं। यहाँ लगभग 2000 के आस पास वकील होंगे, हर साल बढ़ भी जाते हैं। ठीक संख्या तो मुझे नहीं मालूम। पर उसमें से लड़कियों की संख्या इतनी है कि गिन के बताई जा सकती है, और गिनने के लिए आपकी उँगलियों पे बने 30 निशान ही काफी हैं। शायद वो भी ज़्यादा ही हैं। महिला वकीलों की इतनी कम संख्या होने के अनेकों कारण है। एक तो अब ये प्रोफेशन सम्माननीय नहीं रह गया, दूसरा उन्नति और बढ़त का कोई स्कोप नहीं, तीसरा पुरुषों के वर्चस्व में अपना स्थान बनाने और जमने के लिए अद्वितीय शक्ति और सामर्थ्य की अवश्यकता है, और चौथा ये कि कचहरी में काम ही बस इतना होगा कि सालों-साल में केवल दरखास्त लगाना और तारीख़ लेना ही सीख पाएँगी। पांचवा ये कि पुलिसवालों, जजों, अर्दलियों, पेशकारों, और कार्यालय कर्मचारियों से साथ-गांठ करना सीखने में या तो सफलता नहीं मिलेगी या फिर जब तक मिलेगी तब तक आधी उम्र बीत गयी होगी। जुगाड़ सीखना, आदर्शों के खिलाफ जाना और मुवक्किल पे फीस के मामले में रहम ना खाना, ये सब गृहण करने में महिलाओं को थोड़ी तकलीफ होती है और इसलिए पुरुषों के मुक़ाबले वक़्त भी ज़्यादा लगता है।

2012 में जब मैंने कचहरी जाना शुरू किया तो सबसे ज़्यादा बुजुर्ग वकीलों की हेय दृष्टि का सामना करना पड़ा। छोटा शहर और जैसा कि मैंने कहा कि अब वकालत सम्माननीय नहीं रही तो लड़कियों को इस पेशे में बर्दाश्त करना पुराने लोगों के लिए खास तौर से मुश्किल होता है। ‘लड़ाका हो जाएगी, हर समय बहस करेगी, कोई शादी नहीं करेगा, ससुराल वाले परेशान रहेंगे’ आदि इत्यादि। ये सब सोच सामान्य सी बात है। ‘अब इत्ती-इत्ती लड़कियां खड़ी होंगी हमारे सामने बहस करने के लिए।‘ ये तो वाकई गंभीर समस्या है। अजब बात है कि जब नए और कम उम्र के लड़के आते हैं वकालत में तो इन्हीं बुज़ुर्गवारों को उनका स्वागत होता है और वो उन्हें आगे प्रशिक्षित करने के लिए तत्पर रहते हैं। जिन वकीलों के बेटे उनके अपने प्रॉफ़ेशन में नहीं आते उन्हें एक अच्छे जूनियर की तलाश और अपेक्षा होती है, जो उनका काम सीख के ना सिर्फ उनकी मदद करता रहे बल्कि उनकी अनुपस्थिति में उनका बस्ता भी संभाले। पर ये जूनियर एक लड़की कभी नहीं हो सकती। मज़े की बात ये है कि अक्सर लड़के वकीलों से काम सीख कर और तो और उनके मुवक्किल हड़प कर जल्दी ही अपनी दुकान सजा लेते हैं और चूंकि वकील साहब पहले ही बुजुर्ग हैं तो वो इसे ना तो रोक पाते हैं ना ही अपनी आवाज़ उठा पाते हैं। माजरा ये होता है कि फिर खुद से ज़्यादा उसकी दुकान चलवा रहे होते हैं।

ऐसा नहीं कि सारे ही वकील महिलाओं की वकालत के खिलाफ हैं, कुछ बहुत समर्थन भी करते हैं और सहायता भी। हेय दृष्टि के साथ-साथ मुझे भी अनेकों का सहयोग और समर्थन मिला। मेरे अपने सीनियर साहब ने मुझे पर बहुत विश्वास दिखाया और आस पास बैठने वाले बुजुर्ग वकीलों ने भी मेरे कार्यकाल के दौरान मुझे अपना भरपूर सहयोग दिया। चूंकि मैंने मात्र साढ़े चार वर्ष का ही समय दिया है अपनी वकालत को। पर अनुभव इतने कमाए हैं कि ता-उम्र के सबक मिल गए हैं। सबसे ज़्यादा पीड़ा देने वाली बात ये ही रही है कि केवल महिला अधिवक्ताओं को ही नहीं बल्कि महिला जजों को भी इस जेंडर असमानता का सामना करना पड़ता है। कोई समक्ष भले ही ना आलोचना करे या उनके ज्ञान के बारे में निर्णय ले पर उनकी आलोचना अधिवक्ताओं के लिए भरपूर मनोरंजन का साधन बनती है। यहाँ तक कि रौबदार और रसूकदार वकील भरी अदालत में उन्हें डोमिनेट करने का पूर्ण प्रयास करते हैं, मात्र इसलिए क्यूंकी वो एक महिला हैं। बड़ी साधारण सी बात है जब भी किसी नए उम्र के जज  की नियुक्ति होती है चाहे वो महिला हो या पुरुष, तो उसे काम और तरीका सीखने समझने में वक़्त लगता है। तब तक उनका सहयोग पेशकार और अधिवक्तागण भी करते हैं। पर यहाँ भी फर्क दिखाई देता है। पुरुष जजों की तुलना में महिला जजों को सहयोग से ज़्यादा दबाव बनाने जैसी परिस्थिति का सामना अधिक करना पड़ता है।    


शुक्रवार, 8 जून 2018

न्याय+आलय


भाग 5
डी जे वाले बाबू मेरा गाना बाजा दो, डी जे वाले बाबू मेरा गाना बाजा दो, गाना बाजा दो, गाना बाजा दो

अरे नहीं हमारी कचहरी में कोई डी जे वाले बाबू नहीं होते जो गाना बजाते हों। हाँ, पर हमारे यहाँ डी जे वाले साहब होते हैं। बड़े साहब यानी डिस्ट्रिक्ट जज (जिला जज)। हम इन्हें शॉर्ट फॉर्म में डीजे कहते हैं। अब गाना कुछ ऐसे गाया जा सकता है:

डी जे वाले साहब मेरा केस लगा दो, डी जे वाले साहब मेरा केस लगा दो, केस लगा दो, केस लगा दो

हाँ जी, साहब के यहाँ केस लगा है या नहीं, या लिस्ट में ही पड़ा है, देखना पड़ता है। डी जे आज केस सुनेंगे या नहीं, या बस तारीख दे देंगे क्या पता? डी जे साहब के पेशकार से बना के रखनी पड़ती है। जैसे शिव जी के कानों में बात पहुँचाने के लिए नंदी के कानों में अपनी मनोकामना कहनी पड़ती है बस कुछ वैसे ही डीजे तक अपनी मौखिक अर्ज़ी पेशकार के कानों से हो कर गुज़रती है।
यूं तो कचहरी बहुत बड़े वर्ग में फैली होती है। पर इतने कोर्ट रूम और उनके कार्यालयों में से जो सबसे बेहतरीन कमरा होता है वो है हमारे डीजे का। लंबा इतना कि लगे ईरान से तूरान तक फैला है। बाकी सारे कमरे इतने चुन्ने-मुन्ने होते हैं कि इसकी लंबाई ऐसी ही लगती है। कमरे में ढेर सारे पंखे लगे होते हैं, पूरे कमरे में हवा चाहिए ना। सबसे अच्छी बात ये है कि इस एक कमरे को शायद खास डिज़ाइन के साथ बनाया जाता है। बिलकुल ऐसी जगह पर जहां गर्मियों की तपन से ये बचा रहे। यानी पूरी कचहरी का ये सबसे शीतल कक्ष। चिलचिलाती धूप से जूझ कर इस कमरे में घुसते ही जन्नत का एहसास होता है।

इस एक कमरे की अपनी शान होती है। नए-नए वकील बनो तो यहाँ घुसने में ऐसा डर लगता है जैसे स्कूल में प्रिन्सिपल के कमरे में जाने से लगता है। कमरे में सबसे पीछे दीवार से लग कर लाइन से कुर्सियाँ और उसके आगे मेज़ रखी होती हैं जिनका प्रयोग केवल पुलिस अधिकारी करते है। सिपाही खड़े ही रहते हैं। आगे बढ़ने पर कुछ दूरी पे कमरे के ठीक बीचों बीच 10-15 कुर्सियाँ पड़ी होती हैं, वकीलों के बैठने के लिए। कमरे के बाएँ भाग में सरकारी वकील की कुर्सी और मेज़ होती है और दायें भाग में एक लंबा सा कटघरा। जिसमें एक साथ 4-5 अपराधी खड़े हो सकते हैं। कमरे में सबसे आगे होता है एक ऊंचा सा प्लैटफ़ार्म, जिस पर एक और भी ऊंचा सा डाइस। उस डाइस की बाएँ तरफ स्टेनो और दायें तरफ पेशकार की कुर्सी, और दोनों के बीच में बड़े जज साहब की ऊंची से कुर्सी। डाइस पर ढेर सारी फाइलें, पेन स्टैंड, स्टैंड वाली दफ्ती और बाकी कुछ कोरे कागज़। पीछे की दीवार पर गांधी जी की तस्वीर भी होती है। बाकी कोई तस्वीर होगी या नहीं, या किस की होगी ये उस समय की राजनीतिक परिस्थिति पर निर्भर करता है। होने को तो पंडित नेहरू और जिन्ना की भी तस्वीर हो सकती है। सब कुछ बिलकुल वैसा, जैसा कि हम किसी भी फिल्म में देखते हैं। पर वो न्याय की देवी की मूर्ति और वो लकड़ी का हथोड़ा यहाँ भी नहीं हैं। हाँ, एक अर्दली भी होता है जिसका काम होता है केस के वादी और परिवादी के नाम की पुकार लगाना और इस बात का ध्यान रखना कि अनावश्यक भीड़ कमरे के अंदर प्रवेश ना करे।

पूरी कचहरी में बस ये ही एक अनुशासित जगह मालूम पड़ती है। जनता के साथ-साथ वकील भी यहाँ अनुशासित रहते हैं। बेवजह की बातचीत नहीं, किसी तरह का शोर नहीं, जनता की भीड़ नहीं। डीजे के सामने अधिवक्ता अनावश्यक बहस भी नहीं करते। जैसे अन्य अदालतों में हो जया करती है। ये फर्क कुछ ओहदे का भी होता है। वैसे भी यहाँ तक सारे वकील नहीं आते, क्यूंकी कुछ चुनिन्दा केस ही डीजे कोर्ट तक आते हैं।

कुर्सी की भी अपनी ताकत, सम्मान और रौब होता है। जितनी ऊंची कुर्सी उतना ऊंचा रुतबा। पर सेक्सिस्म (sexism) की मार यहाँ भी पड़ती है। हर अदालत में ऐसा होता है या नहीं मुझे नहीं पता पर मैंने यहाँ देखा है। डीजे अगर महिला है तो  उसकी क्षमता और समझ को अधिवक्ता कम ही आँकते हैं। उस कुर्सी का सम्मान करना उनकी मजबूरी है अन्यथा वो इसी प्रयास और आशा में रहते हैं कि कोई पुरुष डीजे आ कर कार्यभार संभाले। जी हाँ, डीजे का स्थानांतरण कुछ हद तक अधिवक्ताओं के हांथ में भी होता है।

सेक्सिस्म (sexism), रेसिस्म (racism), कास्टिस्म (casteism) ये सब भी कचहरी, अधिवक्ता और अदलतों से दूर नहीं है। इसके बारे में विस्तार से फिर कभी।


सोमवार, 4 जून 2018

न्याय+आलय


भाग-4

गर्मी की लू और पसीने की बू, काले कोट का वज़न और पसीने की टपकन, चारों तरफ टाइपराइटर की टक-टक और सब्जी मंडी जैसी भगदड़, ये सब एक वकील की रोज़मर्रा जिंदगी का हिस्सा है। सिर्फ गरमियाँ ही नहीं बरसात और सर्दी भी कम ज़ुल्म नहीं ढाती हम पे। खुले में टपकते हुए टीन शेड के नीचे, तड़ातड़ बरसते पानी में फाइलों से खोपड़ी बचाते हुए सीट से कोर्ट रूम तक जाने की रेस हर वकील को फिट रखती है। जो बुजुर्ग हैं, दिव्याङ्ग हैं या फिर अपने वज़न से परेशान हैं वो अपने-अपने जूनियर्स को दौड़ा दिया करते हैं और खुद धीरे-धीरे पीछे-पीछे चलते जाते हैं। वो क्या है ना हर कोर्ट का टाइम फ़िक्स्ड होता है सुनवाई का। वक़्त पे पहुँचों, पुकार पे अपनी बात न कह पायी तो तारीख आगे बढ़ जाएगी।

पर सब के पास जूनियर्स नहीं होते तो उन्हे थोड़ी दिक्कत हो जाती है, या तो समय से पहले ही सीट से उठ लो या किसी और वकील की मदद लो। पर मदद तो सब एक दूसरे की कर ही देते हैं। दिव्याङ्ग, बुजुर्गवार और वज़नदार वकीलों की तकलीफ तो जज साहब भी समझते हैं।

सर्दी का अपना अलग मज़ा होता है साहब। जहां गर्मी में चिलचिलाती धूप और तीखी गरम हवाएँ वहीं सर्दी में कड़ाके की सर्दी, कोहरा और हड्डी फाड़ देने वाली शीतलहर। जितने भी कपड़े पहन जाओ कम ही मालूम पड़ते हैं। पुराने सेट्टल्ड और रुआबदार वकील जिनके पास अपने केबिन होते हैं वो तो हीटर भी लगा लिया करते हैं और उनके सहारे आस पास के वकीलों का भी भला हो जाता है। सब अचानक से मिलनसार जो हो जाते हैं और आखिर केबिन में आ कर दुआ सलाम करना तो बनता ही है। अब आए हैं तो कुछ देर बैठेंगे भी। जजों को तो हीटर सुविधा उपलब्ध होती ही है तो उनके साथ पेशकार और अर्दली का भी वक़्त सही कट जाता है।

वकालत के सारे आनंद तो 80% वकील लेता है जिसके पास सिर्फ एक टीन शेड, दो कुर्सियाँ, एक छोटी सी बेंच या ज़्यादा हुआ तो एक तखत होता है। 4 बम्बूओं पे खड़ा वो टीन शेड उसकी जिंदगी का एक अहम हिस्सा होता है। अगर कचहरी में वो एक छोटी सी जगह उसे मिल जाए और वो बम्बू पे अपना तम्बू गाड़ दे तो समझो कि उसने वकालत कि अपनी पहली सीढ़ी चढ़ ली।

फिर साल दर साल इसी टीन की छत के नीचे उसकी जिंदगी के दिन गुज़रते हैं, यहीं वो वकालत के सारे लेवेल्स पार करते-करते बिगिनर से एक्सेलेन्स तक पहुंचता है। वकालत एक ऐसी कला है जिसमें मंझने में बरसों लग जाते हैं। जो सारे गुर सीख जाता है वो आसमान की ऊँचाइयाँ भी छू लेता है और जो ना सीख पाया वो बिगिनर का बिगिनर ही रह जाता हैं। ये भी एक जुनून है साहब लग गया तो अर्श ना लगा तो फर्श।