शुक्रवार, 22 जून 2018

न्याय+आलय


भाग 7

इस शृंखला के दूसरे भाग में मैंने शोषण शब्द का प्रयोग किया था। आज उसी के बारे में बताती हूँ। कचहरी में सिर्फ न्याय ही नहीं शोषण भी होता है। वो भी किसी एक व्यक्ति विशेष के साथ नहीं लगभग हर उस व्यक्ति के साथ जो न्यायालय से संबंध रखता है। सबसे नीचे से शुरू करें तो मुवक्किल और सबसे ऊपर की बात करें तो जज। सही मायने में सभी शोषक भी हैं और शोषित भी। कभी मुवक्किल वकील का तो कभी वकील मुवक्किल का शोषण कर लेता है। कभी जज वकील का तो कभी वकील जज का। अक्सर पेशकार, दफ्तरी, कार्यालय कर्मचारी, अर्दली, वादी और प्रतिवादी का शोषण कर लेते हैं तो कभी-कभी कोई वादी-प्रतिवादी भी उन पर भारी पड़ जाता है। यहाँ सभी उदाहरणों में शोषण का भाव केवल और केवल आर्थिक है। कभी वकील मुवक्किल से मनमाने पैसे ऐंठ लेता है, कभी मुवक्किल बिना फीस चुकाए ही अपना काम निकाल लेता है। ये ही सिलसिला सभी पदों पर आसीन लोगों और जनता के बीच चलता ही रहता है।

सारे जज इस प्रकार के शोषण की श्रेणी में नहीं आते। कुछ आते हैं। अब चूंकि भ्रष्टाचार हर विभाग में है तो कचहरी में भी है। पर फिर भी मेरा अनुभव है कि न्यायालय में भ्रष्टाचार का चरम नहीं है। हाँ, पर न्यायाधीशों को राजनीतिक दबाव और शोषण का शिकार होना पड़ता है। वादों की अधिकता और हाइ प्रोफ़ाइल केसेज़ में निर्णय देने का तनाव बहुत गंभीर होता है।

खैर कचहरी में जो सबसे ज़्यादा शोषित है वो है किसी भी वकील का जूनियर। छोटे शहर की कचहरी में कोई अधिवक्ता किसी को जूनियर रखते हुए उसे स्टाइपेंड नहीं देता। वैसे तो हमारी खुद की मजबूरी होती है वकालत के गुर सीखने के लिए एक गुरु की शरण लेना और जैसा कि सर्वविदित है या कहें कि पुरातन काल से प्रथा है कि गुरु से ज्ञान लेने के लिए उसे गुरु दक्षिणा देते हैं, ना कि ज्ञान लेने की प्रक्रिया में किए गए उसके निजी कार्यों के लिए पारिश्रमिक। तो बस गुरू की शरण में आओ और लग जाओ काम पे। अब होगा क्या कि गुरु जी, जो आपके आने से पहले तक खुद करते थे, वो अब चेले से कराएंगे। जैसे दरख्वास्त लिखना, अदालत में जमा करना, तारीखेँ लाना, संबन्धित अदालत के कार्यालय में जा कर वाद से जुड़ी सूचनाएँ इकट्ठी करना, पीने के लिए पानी लाना, इत्यादि-इत्यादि। खैर ये सब ज़रूरी है, सीखने के लिए और पानी पिलाना तो पुण्य का काम है।

पर इस सब में शोषण कहाँ है? अरे भाई! आते-आते ही शोषण शुरू थोड़े हो जाएगा। अब बात ये है कि उपरलिखित कार्य कोई जूनियर कितने दिन में सीख जाता है। 15 दिन या बहुत से बहुत 1 महीना। हाँ, सारी अदालतों और उनके कार्यालयों के नाम और रास्ते याद करने में थोड़ा समय और लगता है। बीच-बीच में न्यायालय परिसर में परिवर्तन भी होते रहते हैं। कब कौन सी अदालत का कमरा बदल जाएगा पता नहीं चलता, जब ढूंढते हुए पहुँचो तो कहीं ना कहीं मिल ही जाएगी। चलिये मान लिया कि दरख्वास्त लिखने का गुर सीखने में भी कुछ और समय लगता है। क्यूंकी इन प्रार्थनापत्रों के भी बहुतेरे प्रकार होते हैं। इन्हें रटा नहीं जा सकता, लिखते-लिखते ही अभ्यास होता है। सब मिला लो तो भी अधिकतम 6 महीने। 6 महीनों में कचहरी अपरिचित से अपनी-अपनी लगने लगती है। ज़्यादातर लोग पहचानने लगते हैं। पर इस सब में गुरु जी को ये समझ नहीं आता कि अब दरख्वास्तों और तारीखों से आगे बढ़ने का समय आ गया है। अब ये शिष्य के ऊपर भी निर्भर है कि उसने वो सीख पाया या नहीं जो गुरु जी ने सिखाया ही नहीं। कभी-कभी वाद पढ़ने का मौका लग ही जाता है, तो गुरु जी के दिमाग को पढ़ने का मौका मिल जाता है। उसके अलावा पोस्ट-मोरटेम रिपोर्ट्स, अस्पताल की जारी की गयी अन्य रिपोर्ट्स, किसी भी तरह का कागज़ी साक्ष्य, पुलिस रिपोर्ट्स आदि भी अगर पढ़ने का मौका मिलता रहा हो तो आपका वकील दिमाग चलता रहता है। पर गुरु जी को यकीन नहीं होता कि आप कितना और क्या सीख चुके हैं। उनका वही ढर्रा चलता रहता है। अगले कई सालों तक। किसी अदालत में जज के सामने बोलने का मौका तभी मिलेगा जब कोई ख़ास बात ना कहनी हो और गुरु जी वो बेख़ास बात खुद जा के कहने में रुचि ना रखते हों। ध्यान रहे कि इन 6 महीनों में जूनियर की कोई आमदनी नहीं होती है और कभी-कभी तो अपनी जेब से भी खर्च करना पड़ जाता है।

ये तो बात रही सिर्फ गुरु जी की, पर आपके गुरु जी के बस्ते के पास जितने वकील बैठते हों वो सब आपके गुरु स्वतः बन जाते हैं। नहीं-नहीं सिखाने के लिए नहीं, अपना-अपना काम कराने के लिए। फलाने कोर्ट में जा रही हो बिटिया, हमाई एप्लिकेशन भी लगा देना, और ये चार दरख्वास्तें और ले जाओ, इन्हें भी जगह पर जमा करती आना। डायरी देखा आना, फलाने केस में तारीख ले आना, वगैहरा। ये सब चलता ही रहता। अब शिष्य/शिष्या की मजबूरी है, सभी का हुक्म बजाना है। 3-3 मंजिलों पे बने ऑफिसों के चक्कर लगाने हैं। धूप में, गर्मी में, पसीने से लथपथ दौड़ लगाते रहना है, वो भी किसी और के काम के लिए जिसके लिए कोई पारिश्रमिक नहीं मिलना है।

जूनियर के शोषण का एक और बेहतरीन उदाहरण है उसका खर्चा करवाना। हर वर्ष ओथ कमिशनर (oath commissioner) के लिए नए वकीलों से आवेदन लिए जाते हैं और जो चुने जाते हैं वो 1 वर्ष के लिए ओथ कमिशनर के रूप में कार्यरत रहते हैं। ओथ कमिशनर का काम होता है एफ़िडेविट्स, बेल एप्लीकेशन्स, इत्यादि पर व्यक्ति का वेरिफिकेशन कर के टिकट और मोहर लगाना और अपने दस्त्ख्वत करना। इसके लिए उसे वो टिकट यहीं कचहरी से खरीदने पड़ते हैं (50-100 या अधिक रुपए के) और फिर जब भी कोई वेरिफिकेशन करना होता है तो उसके बदले उसकी फीस मिलती है (10-20 रुपये पर टिकट)। पर गुरु जी और आस पास वाले ना माने हुए गुरु भी वेरिफिकेशन करा जाते हैं, हस्ताक्षर-मोहर-टिकट सब लगवा जाते हैं पर फीस देना उन्हें याद नहीं रहता। मैंने तो अपनी वकालत के पहले साल में ही ये तमाशा देख लिया था। दोबारा ओथ कमिश्नर के लिए आवेदन ही नहीं किया।      

अब जूनियर शोषित लड़का है या शोषित लड़की इसका भी फर्क पड़ता है। मेहनत कराने के मामले में मेरी कचहरी के गुरु लड़कियों पर थोड़ा रहम रखते हैं। लड़कों के शोषण के बारे में बात करूंगी तो ये भाग समाप्त नहीं कर पाऊँगी.......  

रविवार, 17 जून 2018

न्याय+आलय


भाग 6
सेक्सिस्म (sexism), रेसिस्म (racism) और कास्टिस्म (casteism) ये सब तो भारत की प्रमुख विशेषताएँ हैं। इनके बिना भारत का अस्तित्व ही क्या है। सारे संसार से तुलना नहीं करुगी क्यूंकी मैं भारत में रहती हूँ, संसार के किसी अन्य देश में नहीं। ना ही देश छोड़ने या बदलने का कोई इरादा है। हाँ, तो जैसा मैं कह रही थी कि ये विशेषताएँ देश के प्रत्येक क्षेत्र में मिल जाती हैं। कोई भी डिपार्टमेंट इससे अछूता शायद ही हो। मुझे उम्मीद नहीं। तो फिर कचहरी कैसे इस सब से दूर रह सकती है। जी बिलकुल, मेरी कचहरी में भी सब मौजूद है।

सेक्सिस्म या जेंडर इनइक्वालिटी (gender inequality), सरल भाषा में कहूँ तो औरत और मर्द के बीच की प्रोफेशनल असमानता। यूं तो ये असमानता का कोई एक निश्चित क्षेत्र नहीं है फिर भी प्रोफेशनल पर खासतौर से ज़ोर इसलिए दे रही हूँ क्यूंकी यहाँ वकालत के संबंध में बात हो रही है। कमाल की बात है ना कि वैसे तो अक्सर पुरुष ये ताना मारते हैं कि औरतें बहस में बहुत तेज़ होती हैं और उनसे बहस में जीता नहीं जा सकता। हाँ, जो काफी हद तक ठीक भी है। तो फिर इसी तथ्य के मद्देनजर अगर औरत वकालत पढ़ के वकील बन जाती है तो इसमें इतनी तकलीफ की बात क्यूँ है और अचानक ही उसकी तर्क और बहस करने की क्षमता पर प्रश्ञ्चिंह क्यूँ लगा दिया जाता है।

मुझे नहीं पता कि बड़े शहरों की कचहरी में भी या उच्च और सर्वोच्च न्यायलाय में भी यही स्थिति है या नहीं। मैं वो जानती हूँ जो अनुभव मुझे अपने जिले की कचहरी से प्राप्त हुए हैं। यहाँ लगभग 2000 के आस पास वकील होंगे, हर साल बढ़ भी जाते हैं। ठीक संख्या तो मुझे नहीं मालूम। पर उसमें से लड़कियों की संख्या इतनी है कि गिन के बताई जा सकती है, और गिनने के लिए आपकी उँगलियों पे बने 30 निशान ही काफी हैं। शायद वो भी ज़्यादा ही हैं। महिला वकीलों की इतनी कम संख्या होने के अनेकों कारण है। एक तो अब ये प्रोफेशन सम्माननीय नहीं रह गया, दूसरा उन्नति और बढ़त का कोई स्कोप नहीं, तीसरा पुरुषों के वर्चस्व में अपना स्थान बनाने और जमने के लिए अद्वितीय शक्ति और सामर्थ्य की अवश्यकता है, और चौथा ये कि कचहरी में काम ही बस इतना होगा कि सालों-साल में केवल दरखास्त लगाना और तारीख़ लेना ही सीख पाएँगी। पांचवा ये कि पुलिसवालों, जजों, अर्दलियों, पेशकारों, और कार्यालय कर्मचारियों से साथ-गांठ करना सीखने में या तो सफलता नहीं मिलेगी या फिर जब तक मिलेगी तब तक आधी उम्र बीत गयी होगी। जुगाड़ सीखना, आदर्शों के खिलाफ जाना और मुवक्किल पे फीस के मामले में रहम ना खाना, ये सब गृहण करने में महिलाओं को थोड़ी तकलीफ होती है और इसलिए पुरुषों के मुक़ाबले वक़्त भी ज़्यादा लगता है।

2012 में जब मैंने कचहरी जाना शुरू किया तो सबसे ज़्यादा बुजुर्ग वकीलों की हेय दृष्टि का सामना करना पड़ा। छोटा शहर और जैसा कि मैंने कहा कि अब वकालत सम्माननीय नहीं रही तो लड़कियों को इस पेशे में बर्दाश्त करना पुराने लोगों के लिए खास तौर से मुश्किल होता है। ‘लड़ाका हो जाएगी, हर समय बहस करेगी, कोई शादी नहीं करेगा, ससुराल वाले परेशान रहेंगे’ आदि इत्यादि। ये सब सोच सामान्य सी बात है। ‘अब इत्ती-इत्ती लड़कियां खड़ी होंगी हमारे सामने बहस करने के लिए।‘ ये तो वाकई गंभीर समस्या है। अजब बात है कि जब नए और कम उम्र के लड़के आते हैं वकालत में तो इन्हीं बुज़ुर्गवारों को उनका स्वागत होता है और वो उन्हें आगे प्रशिक्षित करने के लिए तत्पर रहते हैं। जिन वकीलों के बेटे उनके अपने प्रॉफ़ेशन में नहीं आते उन्हें एक अच्छे जूनियर की तलाश और अपेक्षा होती है, जो उनका काम सीख के ना सिर्फ उनकी मदद करता रहे बल्कि उनकी अनुपस्थिति में उनका बस्ता भी संभाले। पर ये जूनियर एक लड़की कभी नहीं हो सकती। मज़े की बात ये है कि अक्सर लड़के वकीलों से काम सीख कर और तो और उनके मुवक्किल हड़प कर जल्दी ही अपनी दुकान सजा लेते हैं और चूंकि वकील साहब पहले ही बुजुर्ग हैं तो वो इसे ना तो रोक पाते हैं ना ही अपनी आवाज़ उठा पाते हैं। माजरा ये होता है कि फिर खुद से ज़्यादा उसकी दुकान चलवा रहे होते हैं।

ऐसा नहीं कि सारे ही वकील महिलाओं की वकालत के खिलाफ हैं, कुछ बहुत समर्थन भी करते हैं और सहायता भी। हेय दृष्टि के साथ-साथ मुझे भी अनेकों का सहयोग और समर्थन मिला। मेरे अपने सीनियर साहब ने मुझे पर बहुत विश्वास दिखाया और आस पास बैठने वाले बुजुर्ग वकीलों ने भी मेरे कार्यकाल के दौरान मुझे अपना भरपूर सहयोग दिया। चूंकि मैंने मात्र साढ़े चार वर्ष का ही समय दिया है अपनी वकालत को। पर अनुभव इतने कमाए हैं कि ता-उम्र के सबक मिल गए हैं। सबसे ज़्यादा पीड़ा देने वाली बात ये ही रही है कि केवल महिला अधिवक्ताओं को ही नहीं बल्कि महिला जजों को भी इस जेंडर असमानता का सामना करना पड़ता है। कोई समक्ष भले ही ना आलोचना करे या उनके ज्ञान के बारे में निर्णय ले पर उनकी आलोचना अधिवक्ताओं के लिए भरपूर मनोरंजन का साधन बनती है। यहाँ तक कि रौबदार और रसूकदार वकील भरी अदालत में उन्हें डोमिनेट करने का पूर्ण प्रयास करते हैं, मात्र इसलिए क्यूंकी वो एक महिला हैं। बड़ी साधारण सी बात है जब भी किसी नए उम्र के जज  की नियुक्ति होती है चाहे वो महिला हो या पुरुष, तो उसे काम और तरीका सीखने समझने में वक़्त लगता है। तब तक उनका सहयोग पेशकार और अधिवक्तागण भी करते हैं। पर यहाँ भी फर्क दिखाई देता है। पुरुष जजों की तुलना में महिला जजों को सहयोग से ज़्यादा दबाव बनाने जैसी परिस्थिति का सामना अधिक करना पड़ता है।    


शुक्रवार, 8 जून 2018

न्याय+आलय


भाग 5
डी जे वाले बाबू मेरा गाना बाजा दो, डी जे वाले बाबू मेरा गाना बाजा दो, गाना बाजा दो, गाना बाजा दो

अरे नहीं हमारी कचहरी में कोई डी जे वाले बाबू नहीं होते जो गाना बजाते हों। हाँ, पर हमारे यहाँ डी जे वाले साहब होते हैं। बड़े साहब यानी डिस्ट्रिक्ट जज (जिला जज)। हम इन्हें शॉर्ट फॉर्म में डीजे कहते हैं। अब गाना कुछ ऐसे गाया जा सकता है:

डी जे वाले साहब मेरा केस लगा दो, डी जे वाले साहब मेरा केस लगा दो, केस लगा दो, केस लगा दो

हाँ जी, साहब के यहाँ केस लगा है या नहीं, या लिस्ट में ही पड़ा है, देखना पड़ता है। डी जे आज केस सुनेंगे या नहीं, या बस तारीख दे देंगे क्या पता? डी जे साहब के पेशकार से बना के रखनी पड़ती है। जैसे शिव जी के कानों में बात पहुँचाने के लिए नंदी के कानों में अपनी मनोकामना कहनी पड़ती है बस कुछ वैसे ही डीजे तक अपनी मौखिक अर्ज़ी पेशकार के कानों से हो कर गुज़रती है।
यूं तो कचहरी बहुत बड़े वर्ग में फैली होती है। पर इतने कोर्ट रूम और उनके कार्यालयों में से जो सबसे बेहतरीन कमरा होता है वो है हमारे डीजे का। लंबा इतना कि लगे ईरान से तूरान तक फैला है। बाकी सारे कमरे इतने चुन्ने-मुन्ने होते हैं कि इसकी लंबाई ऐसी ही लगती है। कमरे में ढेर सारे पंखे लगे होते हैं, पूरे कमरे में हवा चाहिए ना। सबसे अच्छी बात ये है कि इस एक कमरे को शायद खास डिज़ाइन के साथ बनाया जाता है। बिलकुल ऐसी जगह पर जहां गर्मियों की तपन से ये बचा रहे। यानी पूरी कचहरी का ये सबसे शीतल कक्ष। चिलचिलाती धूप से जूझ कर इस कमरे में घुसते ही जन्नत का एहसास होता है।

इस एक कमरे की अपनी शान होती है। नए-नए वकील बनो तो यहाँ घुसने में ऐसा डर लगता है जैसे स्कूल में प्रिन्सिपल के कमरे में जाने से लगता है। कमरे में सबसे पीछे दीवार से लग कर लाइन से कुर्सियाँ और उसके आगे मेज़ रखी होती हैं जिनका प्रयोग केवल पुलिस अधिकारी करते है। सिपाही खड़े ही रहते हैं। आगे बढ़ने पर कुछ दूरी पे कमरे के ठीक बीचों बीच 10-15 कुर्सियाँ पड़ी होती हैं, वकीलों के बैठने के लिए। कमरे के बाएँ भाग में सरकारी वकील की कुर्सी और मेज़ होती है और दायें भाग में एक लंबा सा कटघरा। जिसमें एक साथ 4-5 अपराधी खड़े हो सकते हैं। कमरे में सबसे आगे होता है एक ऊंचा सा प्लैटफ़ार्म, जिस पर एक और भी ऊंचा सा डाइस। उस डाइस की बाएँ तरफ स्टेनो और दायें तरफ पेशकार की कुर्सी, और दोनों के बीच में बड़े जज साहब की ऊंची से कुर्सी। डाइस पर ढेर सारी फाइलें, पेन स्टैंड, स्टैंड वाली दफ्ती और बाकी कुछ कोरे कागज़। पीछे की दीवार पर गांधी जी की तस्वीर भी होती है। बाकी कोई तस्वीर होगी या नहीं, या किस की होगी ये उस समय की राजनीतिक परिस्थिति पर निर्भर करता है। होने को तो पंडित नेहरू और जिन्ना की भी तस्वीर हो सकती है। सब कुछ बिलकुल वैसा, जैसा कि हम किसी भी फिल्म में देखते हैं। पर वो न्याय की देवी की मूर्ति और वो लकड़ी का हथोड़ा यहाँ भी नहीं हैं। हाँ, एक अर्दली भी होता है जिसका काम होता है केस के वादी और परिवादी के नाम की पुकार लगाना और इस बात का ध्यान रखना कि अनावश्यक भीड़ कमरे के अंदर प्रवेश ना करे।

पूरी कचहरी में बस ये ही एक अनुशासित जगह मालूम पड़ती है। जनता के साथ-साथ वकील भी यहाँ अनुशासित रहते हैं। बेवजह की बातचीत नहीं, किसी तरह का शोर नहीं, जनता की भीड़ नहीं। डीजे के सामने अधिवक्ता अनावश्यक बहस भी नहीं करते। जैसे अन्य अदालतों में हो जया करती है। ये फर्क कुछ ओहदे का भी होता है। वैसे भी यहाँ तक सारे वकील नहीं आते, क्यूंकी कुछ चुनिन्दा केस ही डीजे कोर्ट तक आते हैं।

कुर्सी की भी अपनी ताकत, सम्मान और रौब होता है। जितनी ऊंची कुर्सी उतना ऊंचा रुतबा। पर सेक्सिस्म (sexism) की मार यहाँ भी पड़ती है। हर अदालत में ऐसा होता है या नहीं मुझे नहीं पता पर मैंने यहाँ देखा है। डीजे अगर महिला है तो  उसकी क्षमता और समझ को अधिवक्ता कम ही आँकते हैं। उस कुर्सी का सम्मान करना उनकी मजबूरी है अन्यथा वो इसी प्रयास और आशा में रहते हैं कि कोई पुरुष डीजे आ कर कार्यभार संभाले। जी हाँ, डीजे का स्थानांतरण कुछ हद तक अधिवक्ताओं के हांथ में भी होता है।

सेक्सिस्म (sexism), रेसिस्म (racism), कास्टिस्म (casteism) ये सब भी कचहरी, अधिवक्ता और अदलतों से दूर नहीं है। इसके बारे में विस्तार से फिर कभी।


सोमवार, 4 जून 2018

न्याय+आलय


भाग-4

गर्मी की लू और पसीने की बू, काले कोट का वज़न और पसीने की टपकन, चारों तरफ टाइपराइटर की टक-टक और सब्जी मंडी जैसी भगदड़, ये सब एक वकील की रोज़मर्रा जिंदगी का हिस्सा है। सिर्फ गरमियाँ ही नहीं बरसात और सर्दी भी कम ज़ुल्म नहीं ढाती हम पे। खुले में टपकते हुए टीन शेड के नीचे, तड़ातड़ बरसते पानी में फाइलों से खोपड़ी बचाते हुए सीट से कोर्ट रूम तक जाने की रेस हर वकील को फिट रखती है। जो बुजुर्ग हैं, दिव्याङ्ग हैं या फिर अपने वज़न से परेशान हैं वो अपने-अपने जूनियर्स को दौड़ा दिया करते हैं और खुद धीरे-धीरे पीछे-पीछे चलते जाते हैं। वो क्या है ना हर कोर्ट का टाइम फ़िक्स्ड होता है सुनवाई का। वक़्त पे पहुँचों, पुकार पे अपनी बात न कह पायी तो तारीख आगे बढ़ जाएगी।

पर सब के पास जूनियर्स नहीं होते तो उन्हे थोड़ी दिक्कत हो जाती है, या तो समय से पहले ही सीट से उठ लो या किसी और वकील की मदद लो। पर मदद तो सब एक दूसरे की कर ही देते हैं। दिव्याङ्ग, बुजुर्गवार और वज़नदार वकीलों की तकलीफ तो जज साहब भी समझते हैं।

सर्दी का अपना अलग मज़ा होता है साहब। जहां गर्मी में चिलचिलाती धूप और तीखी गरम हवाएँ वहीं सर्दी में कड़ाके की सर्दी, कोहरा और हड्डी फाड़ देने वाली शीतलहर। जितने भी कपड़े पहन जाओ कम ही मालूम पड़ते हैं। पुराने सेट्टल्ड और रुआबदार वकील जिनके पास अपने केबिन होते हैं वो तो हीटर भी लगा लिया करते हैं और उनके सहारे आस पास के वकीलों का भी भला हो जाता है। सब अचानक से मिलनसार जो हो जाते हैं और आखिर केबिन में आ कर दुआ सलाम करना तो बनता ही है। अब आए हैं तो कुछ देर बैठेंगे भी। जजों को तो हीटर सुविधा उपलब्ध होती ही है तो उनके साथ पेशकार और अर्दली का भी वक़्त सही कट जाता है।

वकालत के सारे आनंद तो 80% वकील लेता है जिसके पास सिर्फ एक टीन शेड, दो कुर्सियाँ, एक छोटी सी बेंच या ज़्यादा हुआ तो एक तखत होता है। 4 बम्बूओं पे खड़ा वो टीन शेड उसकी जिंदगी का एक अहम हिस्सा होता है। अगर कचहरी में वो एक छोटी सी जगह उसे मिल जाए और वो बम्बू पे अपना तम्बू गाड़ दे तो समझो कि उसने वकालत कि अपनी पहली सीढ़ी चढ़ ली।

फिर साल दर साल इसी टीन की छत के नीचे उसकी जिंदगी के दिन गुज़रते हैं, यहीं वो वकालत के सारे लेवेल्स पार करते-करते बिगिनर से एक्सेलेन्स तक पहुंचता है। वकालत एक ऐसी कला है जिसमें मंझने में बरसों लग जाते हैं। जो सारे गुर सीख जाता है वो आसमान की ऊँचाइयाँ भी छू लेता है और जो ना सीख पाया वो बिगिनर का बिगिनर ही रह जाता हैं। ये भी एक जुनून है साहब लग गया तो अर्श ना लगा तो फर्श।

गुरुवार, 31 मई 2018

न्याय+आलय


भाग-3

उस दिन एक बुज़ुर्ग वकील साहब आकर सीट पे बैठे और बतियाने लगे। “बेटा नयी हो लगता, कबसे आना शुरू किया, कहाँ से आती हो, कहाँ से लॉ किया है? अजी साहब धाराप्रवाह प्रश्न पे प्रश्न। समझ नहीं आया कि सिस्टेमैटीकली जवाब दें या कहीं से भी। कुछ बोल पाते उससे पहले ही वो फिर बोल पड़े “अरे वकील साहब एक ज़माना था जब वकीलों का बड़ा रुतबा हुआ करता था, लोग बड़ी इज्ज़त दिया करते थे, 5-5 किलो देसी घी क्लाइंट ऐसे ही बिना मांगे घर पहुँचा जाते थे। अब तो कोई चाय भी नहीं पिलाता उल्टा गुटके के पाउच में निपटाने का प्रयास करता हैं। अब बताओ जो गुटका न खाता हो उसका तो वो भी गया”। सुन के मुझे भी लगा कि गुटका तो मैं भी नहीं खाती फिर याद आया की मुझे तो बाहर चाय भी पीना पसंद नहीं। चलो फिर कोई बात नहीं वैसे भी मुझे मेरे क्लाइंट से ऐसी उमीदें नहीं है। पर इस सब में उनका मुझे वकील साहब कह के संबोधित करना बड़ा अच्छा लगा। ये अच्छा है यहाँ आप लड़का हों या लड़की, कम उम्र हो या उम्र दराज़ सब वकील साहब ही होते हैं। चलो आपसी इज्ज़त तो है!

“और बताइए वकील साहब बिटिया ये कैसी है सीखने में” इस बार उनका सवाल मेरे सिनिअर से था। हाँ जी! कचहरी आके पहले किसी सिनिअर की छत्र छाया में शरण लेनी पड़ती है। बिना कमाई उसका सारा काम संभालना पड़ता है। फिर ये आप पर निर्भर है कि कितने दिन लगते हैं सारी मठेती सीखने समझने में, क्यूंकि वकालत तो पढ़ के ही आये हैं, तो सीखने के लिए बस जुगाड़ टेक्नोलॉजी है और मठेत कैसे बना जाये ये है। “सब सिखा दीजियेगा बिटिया को अब यही भविष्य हैं हमारा, इन्हें ही सब संभालना है आगे, वैसे भी लड़कियां ही आजकल अच्छी निकल रहीं, सब सीख लेती हैं जल्दी-जल्दी, लड़के तो साले निकम्मे ही निकल रहे” उनका दर्द छलक पड़ा। शायद वो भी अपने बेटे से त्रस्त होंगे। खैर इतने सवाल पूछ के, एक का भी जवाब लिए बिना और अपनी सारी बाते कह के बुज़ुर्गवार आगे बढ़ गये दूसरी सीट की तरफ। मै और मेरे सिनिअर बस मूक दर्शक बने बैठे रहे और देखते रहे।

पहला अनुभव था ये, फिर अक्सर या कहें रोज़ ही ऐसा कुछ घटता रहा। वकील तो वकील मुव्वाक्किल भी बड़े सवाल करते हैं। गूगल का ज़माना है भाई सारी विधि पढ़ के आते हैं फिर टेस्ट करते हैं कि वकील हमारा सब जानता है कि नहीं। मजाल है आप बहलाने का प्रयास करें आज का मुवक्किल सब जनता है। तुरंत पकड़ लेगा, और तो और उसकी जानकारी से कम या ज़्यादा धाराओं का ज्ञान आपने उसे कराया तो भी बिगड़ जाएगा क्यूंकी गूगल ने उसे विस्तार में कुछ नहीं समझाया है उसे वही धारा या नियम पता है जो उसने खोजा और गूगल ने उसे बताया। अब गूगल बाबा भी तो कोई खाली नहीं बैठे हैं जो खामखा ही सारी जानकारी उड़ेलते रहें जो उनसे पूछी ही नहीं गयी। ऐसी स्तिथियों में जब कोई अधिवक्ता फँसता है तो फिर वो अपने अस्त्र चलाना शुरू करता है। आखिर उसके ज्ञान के आगे तो गूगल्या के आए हुए मुवक्किल का अधूरा ज्ञान कहाँ तक टिक पाएगा। उसे विस्तार से मुद्दे की गहराई में ले जा कर समझाना पड़ता है, धारा के अंतर्गत उपधारा, उसके अंतर्गत नियम, उसके अंतर्गत उपनियम और उसके भी अंतर्गत जो-जो आता है सब समझाना पड़ता है वो भी ऐसे कि या तो वो समझ जाए या फिर इतना समझ जाए कि कुछ नहीं समझ सकता और कट ले।

पर इतना गहराई में कुछ एक ही अधिवक्ता जाते हैं क्यूंकी अक्सर हम बहुत व्यस्त होते हैं, और जब इतना समय नहीं होता तो फिर हम अपना ब्रह्मास्त्र चलाते हैं- “भक्क साले! आया बड़ा वकील बनेगा......जा फिर लड़ ले अपना केस खुद ही, ले जा ये कागज़ सारे.....दिखाई मत दियो दुबारा....” यकीन मानिए ये वार कभी खाली नहीं जाता। आखिर ब्रह्मास्त्र है खाली कैसे जा सकता है। मुवक्किल दिमाग का दही करना बंद करते हुए भाग जाएगा, हो सकता है एक-दो गाली बकता हुए जाए पर चला जाएगा।

अरे! नहीं-नहीं परमानेंट नहीं गया। अगली तारीख पे लौटना तय है। वकील बदलना कोई आसान प्रक्रिया नहीं। वैसे भी अगली तारीख पे न वकील साहब पुरानी बात को ले कर गुर्राएंगे और मुवक्किल तो वैसे भी अब ज्ञान नहीं बांछेगा।

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मंगलवार, 29 मई 2018

न्याय+आलय


भाग-2

... जी हाँ वकीलों की भी एक कौम होती है। काला कोट बनवा लिया है अब तक, कुछ दिन गुज़ार लिए है मैंने मेरी कचहरी में। बस कुछ ही दिन काफी रहे सबसे ज़रूरी बात समझने में कि हमारी भी एक कौम होती है। वैसे ही जैसे सबकी होती है। यहाँ कौम का मतलब किसी धर्म या जाति के लोगों से नहीं है बिलकुल। कौम जैसे डाक्टरों की, इंजीनियरों की, सफाई कर्मियों वगैहरा-वगैहरा की. पर हम बाकियों जैसे बिलकुल नहीं हैं। हो भी नहीं सकते क्यूंकि “हम तो हम है बाकी सब पानी कम हैं”। वैसे हम सबसे इंटेलेक्चुअल कम्युनिटी को बिलोंग करते हैं. क्यूंकि हम कम्पलसरिली डबल ग्रेजुएट होते हैं। हाँ! और किसी को कुछ बनने के लिए दो बार ग्रेजुएशन नहीं करनी पड़ती. एक वकील ही होता है जिसे वकालत पढने के लिए भी पहले से ग्रेजुएट होना पड़ता है। खैर बाकी सब अपना-अपना काम करते हैं। हम अपना काम कम करते हैं उसके अलावा और बहुत कुछ करते हैं। जैसे मठेती, बकलोली, दलाली, चमचागिरी, दबंगई, इत्यादि-इत्यादि हमारी मुख्य विशेषताएं होती हैं। वकालत तो हमारा साइड प्रोफेशन है।

हाँ! तो बात हो रही थी कौम की। कैसे बताऊँ? उधाराणार्थ जैसे हमारे शहर में बन्दर बहुत हैं। टोली की टोली घूमा करती है पुरे शहर में। अक्सर छतों पर जमावड़ा होता है इनका. ये मुख्यतः पानी की टंकी के ढक्कन तोड़ कर उनमे डुबकी लगाने, पेड़-पौधे उखाड़ के फेंकने, कपड़े फाड़ने, इत्यादि विनाशकारी मकसदों से ही आते हैं। फिर इन्हें डंडों, गुलेल, एयर गन, झाड़ू आदि या जो भी संसाधन मिले उसकी सहायता से खदेड़ा जाता है। पर सिर्फ खदेड़ सकते हैं चोट नहीं मार सकते। मारना तो किसी भी जानवर को नहीं चाहिए पर कहीं धोके में डराते-डराते एयर गन चल गयी या गुलेल लग गयी, या डंडा जड़ गया और एक भी बन्दर चीख गया तो समझ लीजिये आपका आखिरी समय निकट है। उस एक बन्दर की चीख पर सैकड़ों, अनेकों अन्य आकर वहीं इकठ्ठा हो जाएँगे कुछ ही पलों में। इस दृश्य की कल्पना भी न कीजिये। कुछ कल्पना करना है तो ये कीजिये की आप वहां न फंसे हों और दौड़ कर किसी दरवाज़े के पीछे जा छुपे हों। बस बिलकुल ऐसे ही होतें हैं हम अधिवक्तागण भी.

अरे! तारीफ कर रही हूँ। हम भी बहुत सारे हैं और तो और कचहरी के अन्दर सब एक जैसे ही दिखते हैं। एका इतना कि मजाल है कोई गलत बात तो कर जाये, हमसे बड़ा दबंग जो बन के दिखाता है या हमे वकालत पढाता है तो बस एक की आवाज़ पर सारे इकट्ठे हो जाते हैं। फिर चाहे वो क्लाइंट हो या कोई पुलिस वाला, मठेत हो या दबंग, सही हो या गलत, नेता हो अभिनेता हो, हमारे लिए बस टारगेट है (बुजुर्ग, बच्चों और औरतों को हम माफ़ कर देते हैं), और मजेदार बात ये है कि जैसे-जैसे घटना की जानकारी मिलती रहती है वैसे वैसे हम दूर-दूर से आके घटनास्थल पे इकठ्ठा होते रहते है। वो क्या है न कचहरी बहुत बड़ी होती है, टाइम लगता है एक सीट से दूसरी सीट तक पहुँचने में...

पर ऐसा बिलकुल नहीं है कि हममे सहृदयता या सहयोग इत्यादि गुणों की कोई कमी है। आफत में पड़ने वाले अधिवक्ताओं की भी हम सहायता कूद के करते हैं। बुरे समय या मृत्यु जैसी आपदाओं में भी हम अपने अधिवक्ताओं और उनके परिवारों का संबल बनने का पूर्ण प्रयास करते हैं। बेटियों के विवाह में अधिवक्ता पिता का दूसरे अधिवक्तागण बिना मांगे, बिना कहे कार्यभार सँभालते हैं। यहाँ स्पष्ट करूँ कि एक दूसरे के साथ खड़े होने के लिए या मदद करने के लिए कभी हमारी जाति बीच में नहीं आती। हालाँकि “जाति कभी नहीं जाती” पर ये ही हमारी कौम की बड़ी विशेषता है कि “अधिवक्ता का कोई धर्म विशेष नहीं होता वो मात्र अधिवक्ता है”।

“अरे बिटिया ज़रा ये दरख्वास्त लगा आना सी.जे.ऍम. कोर्ट में” बगल वाले बुज़ुर्ग वकील साहब अक्सर हुक्म फरमा देते हैं, उन्हें दमा है बुज़ुर्ग भी हैं इसलिए अपने छोटे मोटे काम मुझसे करवा लेते हैं। क्या करूँ मना भी नहीं किया जाता। हालाँकि ये कोई बड़ी बात नहीं पर दुनिया ऐसी है कि “ऊँगली पकड़ाओ तो पोंचा पकड़ती है”। एक-दो बार ख़ुशी से कर दो उनका काम तो तीसरी बार से उनकी आदत बन जाता है और फिर अपना काम छोड़ उनका पहले करना पड़ता है।

ये भी एक प्रकार का शोषण है। अब शोषण तो हर जगह होता है। बस रूप अनेक हैं। पर भई हम सहयोगी प्रवत्ति के हैं तो......

सोमवार, 28 मई 2018

न्याय + आलय

भाग-1

उस दिन सोमवार था शायद, वो मेरा पहला दिन था। अक्टूबर का महीना, न हल्की न तेज़ धूप पर गर्मी थी, और मैं अपने सफ़ेद सलवार सूट पे दुपट्टे की प्लेटें बना किसी स्कूली बच्ची की तरह कचहरी पहुंची थी। अभी काला कोट नहीं बनवाया था। वक़ालत पढ़ने के बाद यहीं तो आना होता है। बाहर से देखने पे ये जगह बड़ी शानदार और रुआबदार होती है। अंदर घुसते ही याद आ जाती है पुरानी कहावत- "जनती लुगाई और बनती मिठाई कभौं न देखो"। जहाँ से नज़र दौड़ाओ और जहाँ तक दौड़ाओ बस चार बम्बूओं पर सधी टीन की छतें और उनके नीचे बैठे काले कोट। हाँ दूर से बस काले कोट ही नज़र आते हैं। यूँ लगता है मानो चलते फिरते काले कोटों का शहर है जैसे।

मन में बड़ी कल्पनायें थी कोर्ट रूम की। आर्डर-आर्डर करते लकड़ी के एक छोटे से गोले पे बड़ा सा हथोड़ा ठोकते, ऊँची सी कुर्सी, सिंघासन जैसे डाइस के पीछे बैठे जज साहब मिलेंगें। सामने होंगें लम्बे काले चमकदार गाउन पहने दो इम्प्रेस्सिव से वकील। उनके अगल बगल बने दो लकड़ी के कटघरे। पीछे लगी कुर्सियों पर आम जनता की भीड़. यही सब तो देखते आये हैं हम अब तक फिल्मो में। कोर्ट रूम का कुछ ऐसा ही चित्र अंकित था मेरे मन में भी और शायद सबके मन में होता होगा। सिर्फ तब-तक, जब-तक खुद उस जगह के करीब से दर्शन न किये हों।

बस तो हमने भी वकालत पढ़ ली कि साहब बड़ा मज़ा आएगा न्याय की देवी के आँखों पर पट्टी, एक हाथ में तराजू, और दूसरे में तलवार क्यों है पता चलेगा। असल में करीब से देखने पे ये देवी कैसी लगती है बड़ी जिज्ञासा थी। ये काले कोट के पीछे का राज़, ये सफ़ेद वर्दी की वजह और इन सब में सबसे आकर्षक जज साहब का वो हथोड़ा। पर किसी ने सही कहा है दूर के ढोल सुहावने होते हैं. ये सब जिज्ञासाएं गूगल कर दूर कर लेते तो ठीक रहता. पर नहीं कूद पड़े, जाने क्यों काला सफ़ेद खींच लाया हमे यहाँ।

खैर अब आये तो आये तब जाना कि फ़िल्में सचमुच बहुत धोका देती हैं. हाय राम! ऐसा तो कुछ भी नहीं है यहाँ। हाई कोर्ट में होता हो शायद. मेरी कचहरी (जिला न्यायालय) में तो किसी भी कोर्ट रूम में कटघरे ही नहीं है, ऐसे ही वकील साहब मुलजिम को अपने बगल में खड़ा कर लेते है और कोई गीता/कुरान/बाइबिल भी नहीं मंगाई जाती कसम उठाने को। वकील साहब या कभी अर्दली ही कह देता है मुलजिम से “चलो कसम खाओ जो कहोगे सच कहोगे”। अरे! ये भी कोई बात हुई कुछ न सही अम्मा की ही कसम खिलवा दो! (मेरे मन में ये ख़्याल हर बार आता है) और जज साहब यकीन कर लेते है की ये जो अब बयान देगा वो सच ही होंगे, और तो और वो हथौड़ा भी मिसिंग है।

वकालत की असली सच्चाई कुछ फुट के टीन शेड के नीचे दो कुर्सी, एक बेंच और एक मेज़ डाल के बैठने और लू, बरसात और ठण्डी कड़कड़ाने वाली हवाएं झेल के समझ आई। 10-10 रुपये के लिए मुवक्किलों से कितनी झिक-झिक करनी पड़ती है. उसपे भी सुनना पड़ता है “वकील साहब आप काम नहीं करते हमारा बस मेहनताना मांगते हैं”। यही मुवक्किल पेशकार और क्लर्क को बड़ी ख़ुशी-खुशी ऊपर की या कहूँ मेज़ के नीचे की कमाई करा आते है।

न्यायलय यानी न्याय का घर जहाँ लोग न्याय की अपेक्षा से आते हैं यहाँ न्याय होता होगा कभी, अब अन्याय ज्यादा होता है। सब के साथ चाहे वकील हो या मुव्व्क्किल। न्याय की देवी की आँखों पर पट्टी इसलिए है कि कुछ भी देखो मत, जो भी घट रहा है, सही या गलत, टेबल के ऊपर या टेबल के नीचे। हाथ में तराजू इसलिए है कि जिसका पलड़ा भारी हो उसकी तरफ झुक जाओ, और तलवार इसलिए कि पहले कमज़ोर और पीड़ित का पत्ता काटो। काला कोट हम इसलिए पहनते हैं कि थूक भी जाओ हम पर तो दिखे ना, और सफ़ेद वर्दी इसलिए कि हम दिखावा कर सके कि कितने शांतिप्रिय और सात्विक है।

ये सब मेरे निजी विचार और अनुभव हैं। क्यूंकि मेरी कचहरी कुछ ऐसी ही है। यहाँ अब पीड़ित कम और पीड़ा देने वाले ज्यादा आते है न्याय मांगने कि हमें पीड़ा देने का अधिकार दो या हमने पीड़ा दी तो कुछ गलत नही किया. 100 में से 10 होते हैं सच्चे न्याय के हक़दार पर अफ़सोस बाकि 90 उनका समय नष्ट करते हैं।
खैर कुछ भी हो मेरी कचहरी में रौनक हमेशा रहती है चाहे किसी के पास काम हो या नहीं, चाय-पकौड़ी खाने ही चले आते हैं सब और अगर कुछ वकील ज्यादा व्यस्त लग रहे हैं, कुछ अन्य बेकारों को तो, झट से हड़ताल का कोई मुद्दा भी खड़ा कर लिया जाता है। “लो भाई फलाने कारण से आज सारे अधिवक्ता न्यायिक कार्य से विरत रहेंगे”, “मौजा ही मौजा।” “कुछ भी हो पर एका बहुत है वकीलों की कौम में” हाँ! ऐसे ही बात करते है सब. हमारी भी एक अलग कौम होती है..............................


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